🌹"पहाड़ो का मधुमास"🌹
🌹"पहाड़ो का मधुमास"🌹 जब पहाड़ो पर खिलता है, रसभरा महुआ और पलाश, छा हीं जाता है जैसे यहां पर, चहुओर मादक मधुमास। कोयल मिठ्ठू के संग में, मिलजुल कर करता है, मधुकर भी यहां पर प्रवास, जब पहाड़ो पर खिलता है, रसभरा महुआ और पलाश। तब पहाड़ो का भी कठोर, शुष्क अतृप्त मन हर्षाता है, जब यहां जंगलों में महुआ, रसभरा फूल बरसाता है। पिला महुआ और लाल पलाश, का रस में डूबा अंग अंग है, और हरा जंगल जैसे यहां पे, फागुन पर भांग चढ़ा रंग है। भोर में दिनकर की सुनहली, लाली के उठने से भी पहले, मिलती है यहां पे चहुओर, महुआ वसुन्धरा पर फैले। मचलता है पहाड़ी गोरीयों का, पुलकित छलकता नव यौवन, जैसे पलाश के हीं खिल जाने से, खिल आया इनका सारा जीवन। सर पे टोकड़ी लिए खुश है, अभी प्रत्येक ग्रामीण जन, महुआ के तीव्र सुगंध से अभी तो, अपना पहाड़ बन बैठा है मधुवन। अब सृष्टि का एक यक्ष प्रश्न है, आया त्वरित हम सबके लिए, कोई चुप ना बैठा रहे यहाँ पर, बिना इस प्रश्न का उत्तर दिए। क्या सदियों बाद इस धरा पर, हमारा वंश भविष्य भी आगे, इन फूलों के मीठे सुगंध को, क्या कभी अनुभव कर पाएगा, जब ये जीवन मित्र जंगल, ही नहीं ब...