कविता ॥ चलो गाँव की ओर ॥

 कविता ॥ चलो गाँव की ओर ॥


स्चना = उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार


निर्दयी शहर हुआ बेगाना 

चलो गाँव की ओर

नहीं है जीवन का पानी दाना

चलो गाँव की ओर

उजड़ गया शहर का पैमाना

चलो गाँव की ओर

आओ बनायें नया ठिकाना

चलो गाँव की ओर

शहरों में अब संस्कार निशाना

चलो गाँव की ओर

शहर ने छीन ली सबका आशियाना

चलो गाँव की ओर

आओं खेतों से पायें मेहनताना

चलो गाँव की ओर

प्रदुषण से है मुक्ति पाना

चलो गाँव की ओर

दादा दादी से है रिश्ता निभाना

चलो गाँव की ओर

झरने की मीठा जल है पीना

चलो गाँव की ओर

प्रकृति के संग संग है जीना

चलो गाँव की ओर

गुरूजी से है ककहरा सीखना

चलो गाँव की ओर

नदियों की संगीत है सुनना

चलो गाँव की ओर

पहाड़ों की है गीत पे झूमना

चलो गाँव की ओर

दादी से परियों की कहानी है सुनना

चलो गाँव की और

दादा के काँधे पे मेले है घूमना

चलो गॉव की ओर

एक सुन्दर समाज है सजाना

चलो गॉव की ओर

माता पिता का आर्शिवाद है पाना

चलो गाँव की ओर

पड़ोसी के सुख दुःख में साथ निभाना

चलो गाँव की ओर

शाम को चौपाल है लगाना

चलो गाँव की ओर



उदय किशाेर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार

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