कविता ॥ अजब -गजब ॥

 कविता ॥ अजब -गजब ॥


रचना- उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार

9546115088


अजीब फितरत है दुनियाँ की

गजब हसरत है मुनियॉं की

यहाँ हर खेल निराली है

गरीबों की जेब खाली है

गोदामों में अन्न सड़ता है

कोई भूखा ही मरता है

कोई एक एक दाने को रोता है

कोई भूखा ही सोता है

यहाँ हर खेल निराली हे

गरीबों की जेब खाली है


फैंसन का नया जमाना है

बदन नंगा दिखाना है

लज्जा गुदड़ी में शरमाती है

बेशर्मी बिकना में दीखती है

दोष उनका नहीं है यारो

समय का दोष है प्यारा

कोई देशी ही पीता है

कोई लुटमचा विदेश भग जाता है

कहानी सियासत की भारी है

बेईमानों गद्दारों की पारी है

यहाँ हर खेल निराली है

गरीबों की जेब खाली है।


पढ़े लिखे में बेरोजगारी है

भूख में लिप्त सत्ताधारी है

सिंहासन पे बैठा है अब वो

पढकर बेरोजगार रोता है जो

यहाँ पर जान सस्ती है

लुट के लिये गरीबों की बस्ती है

पढ़ा लिखा यहाँ संतरी है

अंगूठा छाप मंत्री है

यहाँ हर खेल निराली है

गरीबों की जेब खाली है


निर्धन सरकारी स्कूल में है पढ़ता

अमीर इंगलिश में हैं गढ़ता

एक स्कूल में खिचड़ी खाता है

एक मस्ती में कन्वेंट जाता है

कोई हिन्दी में पढ़ता है

कोई इंगलिश में लिखता है

हिन्दी हम गरीब की आशा है

अंग्रेजी अमीरों की भाषा है

कोई माँ को माँ जी पुकारता है

कोई पिता को डैड कह बुलाता है

यहाँ हर खेल निराली है

गरीबों की जेब खाली है


गरीबो की कौन सुनता है १

अमीरों की बात सब मानता है

कोई झोपड़ में रोता है

महलों वाला सदा मुस्कुराता है

अमीरी शौक में पलता है

गरीबी रो रो कर जीता है

कोई रोता है रोने दो

कोई मरता है मरने दो

कोई कब फर्क पड़ता है

जो होना है वो होता है

खेल किस्मत की निराली है

यहाँ हर हाथ काली है

कोई भरोसा का ना मिलता है

भरोसा खुद अपनी किस्मत पे रोता है

यहाँ हर खेल निराली है

गरीबों की जेब खाली है


सत्ता आती है जाती है

सत्ता फिर से मिल जाती है

परवाह नहीं है जनता की

जनता बेकार ही चिल्

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