बेशर्म कोरोना

 बेशर्म कोरोना


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यह कैसी माया है

कोरोना की अजब छाया है,

होली में डराया

होली की खुशियां डस कर भी

इसे नहीं चैन आया,

दिन भर सेनेटाइजर से बार बार

हाथ धुलवाया।

माँ बाप ,दादी बाबा, नाना नानी,

चाचा चाची,पति पत्नी बच्चे

परिवार, रिश्तेदार,समाज के बीच

अपना डर फैलाया।

शारीरिक दूरी का ऐसा जहर फैलाया।

मासूम बच्चों, बीमारों,लाचारों पर भी

न इसे तरस आया,

मुर्दों तक को इसने नहीं बख्शा,

इसने सबसे भरपूर संबंध बनाया।

मंदिर ,मस्जिद,गिरिजा, गुरूद्वारों को

इसने बंद कराया।

कथा, कीर्तन ,भागवत भंडारे पर

अपना चाबुक चलाया।

नागपंचमी भी हमनें

सूखे सूखे निपटाया,

बच्चों से गुड़िया भी हमनें

घर में ही पिटवाया।

बिन भक्तों भोले बाबा ने

सावन को निपटाया,

मिलते रहे गले ईद में

वो भी न हो पाया।

आया गया रक्षाबंधन भी

पर इसे समझ न आया,

भाई बहनों के अमिट प्यार पर भी

अपना पहरा बैठाया।

बहना रोये भाई सिसके

कोरोना तेरी कैसी ये है माया?

ऐसा लगता है कि

स्वतंत्रता दिवस का लड्डू भी

तू यहीं खाया।

कब कैसे कितने दिन में

वापस तू जायेगा,

या इंसानों के संग

रहने है तू आया है।

बेशर्मी छोड़ कोरोना

अब वापस लौट जा भाया,

तेरी मेजबानी में फंसकर हमनें

क्या क्या नहीं गवांया?

गतवर्ष की ही तरह फिर तू

क्यों जाते जाते 

वापस इस वर्ष भी 

उसी समय आया।

धन्य है तू भी अजब तेरी माया

बेशर्मी, बेहयाई में तू तो

इंसानों से भी आगे आया,

अब तो वापस लौट जा भाया

देख हमनें तेरे आगे

सिर अपना है झुकाया।


👉सुधीर श्रीवास्तव

        गोण्डा, उ.प्र.,

      8115285921



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