शीर्षक-सोच मत मजबूर होकर
शीर्षक-सोच मत मजबूर होकर
सोच मत मजबूर होकर अपने दिल से आएगा,
दौर ए नौ में कोई मिलने सायकिल से आएगा।
हथकरघों ने कर ली ख़ुदकुशी इस बात पर,
था ये ऐलान ए हुक़ूमत कपड़ा मिल से आएगा।
गैस और पेट्रोल ने नींदे उड़ा दीं आंख की,
एक झटका ज़ोर का बिजली बिल से आएगा।
बढ़ गईं सरगर्मियां बजती चुनावी बीन है,
सांप का कुनबा निकल अपने बिल से आएगा।
क्या लगाएगा वो क़ीमत खेत के अहसास की,
जो पसीना शौकिया बस ट्रेड मिल से आएगा।
वो स्वयं हो जाएगा गंगा के जल सा पारसा,
आँसू जब गुज़र कर रूख़ के तिल से आएगा।
बस्ती ए दिल का अँधेरा दूर कर ख़ुद ए 'शिखा',
सोच मत कोई ख़िरद के टॉप हिल से आएगा।
दीपशिखा सागर,वरिष्ठ गीतकार कवयित्री
व गजलगो स्वतन्त्र लेखिका व स्तम्भकार,
प्रज्ञापुरम,गुरैया रोड,छिन्दवाड़ा-मध्यप्रदेश


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