परिचर्चा नारी सशक्तीकरण
परिचर्चा
नारी सशक्तीकरण
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अभी मै सोकर उठा भी नहीं कि अहमदाबाद से हमारे फेसबुक से जुड़े भावनात्मक रुप से पिता तुल्य और मेरे लिए शुभेच्छा रखने वाले प्रेरक की भूमिका निर्वहन कर रहे अंकल जी(श्रद्धेय श्री गोपाल सहाय श्रीवास्तव जी) का फोन आ गया।मैं आँखें रगड़ता हुआ बोला-प्रणाम अंकल,सब ठीक है न?
अंकल-वैसे तो सब ठीक है।लेकिन अभी एक समाचार ने हिलाकर रख दिया।
मैंने पूछा-आखिर कुछ बताइए तो सही।
अंकल-क्या बताऊँ बेटा।नारी सशक्तिकरण के गाने तो खूब गाये जाते हैं,परंतु ये कौन से सशक्तिकरण की बात हो रही है कि इंसान दरिंदों से भी ज्यादा खतरनाक हो गया है।
मैंनें धैर्यपूर्वक उन्हें बताया कि यह सब तो आज जीवन का हिस्सा बन गया है।सरकार एक एक व्यक्ति की रखवाली तो नहीं कर सकती।
अंकल-बात तो सही है,लेकिन ऐसे ही चलता रहा तो स्थितियाँ भयावह होती चली जायेंगी।
मैंनें कहा-ऐसा कुछ नहीं होगा, लोगो को न केवल जागरूक होना होगा, बल्कि इस तरह की घटनाएं किसी के भी साथ घटे,अपने साथ घटी घटना मानकर कदम उठाने होंगे।
अंकल-हाँ बात तो ठीक है,मगर ये तो वही बात है कि बिल्ली के गले में घंटी बाँधे कौन?
तभी मेरे अनुजवत,इंजीनियर अंकुर सिंह भी अचानक काँफ्रेंस के जरिए जुड़ गए और नमस्कार, प्रणाम की औपचारिकता के बाद बोले-दरअसल बात ये है अंकल पहली बात तो यह है कि नारी सशक्तीकरण पर ढिंढोरा पीटने से कुछ नहीं होगा।जब तक महिलाएं मन से मजबूत नहीं होंगी, तब तक कुछ नहीं होगा।मेरी बात का गलत अर्थ मत लगाइगा,मगर महिला ही महिला की पहली बड़ी दुश्मन है। फिर आज के माहौल में जब महिलाएं सफलता के झंडे गाड़ रही हैं,वहीं आधुनिकता और स्वच्छंदता के नाम पर उनके शरीर से कपड़े कम हो रहे हैं।जबकि नारी का गहना है उसकी मर्यादा।आज नारी खुद अपनी मर्यादा तार तार करने में लगी है।
मैं बीच में बोल पड़ा -तो क्या आप ये कह रहे है कि नारी ही नारी सशक्तिकरण की राह में रोड़ा बन रही है?
अंकुर-नहीं सर मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि नारियाँ खुद अगर ठान लें तो हमें नारी सशक्तीकरण का ठिंढोंरा नहीं पीटना पड़ेगा।
अंकल-वो कैसे बेटा?
अंकुर-देखिए अंकल।जैसे हमारे देश पर जब कोई बाहरी संकट आता है, तो देश की सरकार ही नहीं हम सब यानी समूचा देश भी अपने अपने तरीकों से सरकार के साथ एक जुट होता है न।बस उसी तरह हर महिला को किसी भी महिला के कैसा भी संकट आये या उसके साथ अन्याय हो, तो महिलाओं को चाहिए कि वे सब पीड़ित महिला को न्याय दिलाने के लिए कमर कस कर मैदान में कूदे।भले ही अन्याय करने वाला उसका बाप,भाई,बेटा या सगा संबंधी हो।साथ ही महिलाओं को अपनी गरिमा का भी ध्यान रखना होगा।
अधनंगे कपड़ों में कौन उसे लाँछित नहीं कर देगा।इसलिए यदि हम सब पुरुष हो या महिला, मर्यादा का परदा बहुत कमजोर होता है,जो तेज आवाज में भी फटने के खतरे सरीखा होता है।
मैंनें कहा काफी हद तक आप ठीक कह रहे हो,लेकिन अबला महिलाएं भला पुरुषों के खिलाफ कैसे डट सकती हैं?
अंकल-क्यों नहीं हो सकतीं,जब महिलाएं ऊँचे पहाड़ों पर झंडे गाड़ सकती हैं,सेना में जाकर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश के दुश्मनों का मुकाबला कर सकती हैं,तब ये कौन सा मुश्किल काम है।
मैंने अंकल की बात का समर्थन करते हुए कहा-आप की बात सही है,बस उन्हें ये भर समझने की जरूरत है कि उन पर होने वाला हर छोटा बड़ा अन्याय उनके वजूद पर हमला है।
अंकुर-हाँ सर।अच्छा अब मैं विदा लेता हूँ।मुझे आफिस भी जाना।फिर प्रणाम कहकर उन्होंने फोन रख दिया।
अंकल-अच्छा बेटा।अब फोन रखो।मैंने सुबह सुबह तुम्हें उलझा दिया।
मैंनें बात काटते हुए कहा-अरे नहीं अंकल,ऐसा कुछ नहीं है।अच्छा अब मैं भी फोन रखता हूँ।जी चरण स्पर्श
अंकल ने भी सुखी रहो कहकर फोन रख दिया।
■ सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा(उ.प्र.)
8115285921
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