कविता:-परी
कविता:-परी
वो परियों की दुनिया और
उस परीलोक की शहजादी जैसी मेरी बिटिया ।
ख्यालों के उपवन में बेखौफ़ कुलाँचे मारता उसके मन का मृग ..
बावरे पंछी सा आस्माँ को छूती हजारों हसरतें उसकी ।
जिन्दगी जाने कब उसे स्वपनलोक से निकालकर
इन दुनियावि हकीकतों के
भंवर जाल में उसे उलझा दे ।
ये सोच-सोच कर घबराएँ मन मेरा ।
जब भी देखूं अपनी नन्ही परी को मन करता है कि
तारों को उसके बालों में लगा दूँ जुगनुओं को उसके आस पास उड़ा दूँ ।
तितलियों के उसे पंख लगा दूँ ।
बना दूँ उसे एक सुन्दर सी परी ।
नजर ना लगें उसे एक काला टीका लगा दूँ ।
स्वरचित मौलिक रचना निर्मला सिन्हा ग्राम जामरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ से

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