*पंखुड़ी*
*पंखुड़ी*
तुम करो पंखुड़ी को जरा सा अलग,
फिर तबस्सुम सा हर शेर खिल जाएगा।
ताल दे दो अगर प्यार के राग पर,
फिर तरन्नुम में सुर साज़ ढल जाएगा।
ख्वाहिशें थी सुखन पर न अल्फ़ाज़ थे,
दिल मे एहसास थे पर न हालात थे।
लिख न पाया कभी अपने अरमान को,
बेतकल्लुफ कभी भी न जज़्बात थे।
एक मिसरा फ़क़त सी मेरी जिंदगी,
रहनुमा शेर से बन ग़ज़ल जाएगा।
ताल दे दो अगर प्यार के राग पर,
फिर तरन्नुम में सुर साज़ ढल जाएगा।
जुस्तजू में भटकते हुए दर ब दर,
शेर जो भी पढ़े बेबह्र सब पढ़े।
हिम्मतें दो मुझे कर सकूं मौसिकी,
इब्तदा के लिए मुन्तज़िर हैं खड़े।
हो मुनासिब अगर वो किताब ए ग़ज़ल,
नज़्म को मेरी फनकार मिल जायेगा।
ताल दे दो अगर प्यार के राग पर,
फिर तरन्नुम में सुर साज़ ढल जाएगा।
मेरा दिल अंजुमन अब तेरा हो गया,
नींद पहले गयी चैन अब खो गया।
यूं खुदा ने अता की मुझे नेमतें,
हम मिले और हर गम जुदा हो गया।
बस सलामत रखे इश्क़ मेरा खुदा,
मेरा बिगड़ा नसीबा संभल जायेगा।
ताल दे दो अगर प्यार के राग पर,
फिर तरन्नुम में सुर साज़ ढल जाएगा।
©️पंकज त्रिपाठी ✍️
हरदोई (उ प्र)
9452444081

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