लघुकथा-:अधिकार
लघुकथा-:अधिकार
सुहानी दौड़ते हुए अपनी मम्मी से गले लगकर रोते हुए कहती हैं ।बहुत हुआ मम्मी भैय्या को कहने का कोई हक़ नहीं कि यें घर तुम्हारा नहीं ।तुम तो पराई हो कल तुम्हारी शादी होगी और तुम्हे ये घर छोड़ कर जाना होगा यहाँ तुम्हारा कुछ नहीं क्या यें बात सच है ।
मम्मी बोलों ना तुम कुछ बोलतीं क्यो नही हो ।
सुहानी रोते-रोते सिसकने लगतीं हैं उसके गले से रोंधी रोंधी आवाज आती हैं ।सुहानी की मम्मी अनामिका एक गहरे सोंच में डूब जाती हैं उसे अपना बचपना याद आनें लगता हैं ।कि आखिर ये बात है तो सही ।
कैसे मुझे भी बात बात पर यही बताया जाता था कि आखिर तुम अपने माँ बाप की जितनी भी सेवा कर लो आखिर तुम्हे जाना तो पराये घर हीं हैं ।
अचानक ही अनामिका के आँखो से आँसू गिरने लगते हैं ।दूर खड़ा उसका पति संजय सब देखते हुए महसूस कर लेता हैं और बातों की डोर कोवही सम्हालते हुए कहता है क्या सुहानी बेटा तुम भी किस नालायक की बातों को पकड़ कर रो रही हो जिसे ये नहीं पता कि घर की कौन सी चीज कहाँ रखी है वो घर उसका कैसे हो सकता है भला ।सभी को समान का अधिकार हैं
राहुल को ऐसा कहने का कोई हक़ नहीं है ।
सुहानी हर्षित होते हुये क्या सच्ची पापा
सुहानी आगें कहतीं हैं ।
देखना पापा जब मैं बड़ी हो जाऊंगी ना तब आप दोनों को दूर-दूर देशों के यात्राएं करवाऊंगी।
संजय अच्छा सिर्फ कह कर क्या ।
सुहानी कहतीं हैं मतलब पापा मैं नहीं समझीं ।
अरे तुम्हे इसके लिए खूब मेहनत करनी पड़ेगी खूब मन लगाकर पढ़ाई करना पड़ेगा ।ओह्ह हाँ पापा मैं आज से ही खूब मेहनत करूँगी ।
मेरा आशीर्वाद बेटा मुझे पूरा उम्मीद है एक दिन तुम्हारी मेहनत जरूर रंग लाएगी ।
सुहानी प्रसन्न होकर अपने माता-पिता के चरणों को स्पर्श कर पढ़ने चलीं जातीं हैं ।
वहीं अनामिका एकटक अपने पति संजय को देखतीं रहतीं हैं ।
इतनें मैं संजय उसे देखते हुए कहता है पागल तुम परेशान क्यो होतीं हो
जितना हमारे दौलत में हमारे बेटे राहुल का हक है ।उतना ही हक हमारी बेटी सुहाना का भी हैं ।
और ये घर उसीका है, उसीका रहेगा, कभी पराया नहीं होंगा ।
अरे तुम ये क्यो भूल जाती हो अभी वो एक घर परिवार की मालकिन हैं,और हमारी बिटिया रानी हैं ।शादी के बाद वह दो परिवारों की बिटिया और मालकिन बन जाएंगी
वहीं सब सुन रहा राहुल अपनी कहें बातों पर बहुत पछताता हैं ।
सुखी परिवार संपन्न परिवार !
☆ निर्मला सिन्हा
☆ डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़

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