शीर्षक-मैं गृहिणी कहलाती हूँ
शीर्षक-मैं गृहिणी कहलाती हूँ
सभी भावों की धूप में
खुद को मैं जलाती हूँ
उन्हें रंगों में भिगोकर
प्रेम शक्रधनु बनाती हूँ
स्वेद की बूँदो में भी
हीरे सम चमचमाती हूँ
तेरे घाव रुपी उपहार
आंचल से छिपाती हूँ
झुकाकर दोनों कंधो को
अवसर सीढ़ी बनाती हूँ
सबके सपनों में अपने
आहूति पंख लगाती हूँ
पिघलकर मोम के जैसे
साँचों में ढल जाती हूँ
आंच आए जो अपनों पर
खुद को ढाल बनाती हूँ
जो भाए सबके कानों को
वो गीत गुनगुनाती हूँ
रहें मोती सब माला में
यूँ धागा बन मैं जाती हूँ
सजाने इतवार व त्योहार
थकन को भूल जाती हूँ
सब्ज़ी क्या आभूषण भी हों
हिसाब उंगली पे लगाती हूँ
मुँह धुलाती हूँ सूरज का
तारों को लोरी सुनाती हूँ
सच है मैं कुछ नहीं करती
मैं गृहिणी कहलाती हूँ
दीप्ति खुराना,मुरादाबाद-उत्तर प्रदेश


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