शीर्षक -- कर दिया यूँ दरबदर
शीर्षक -- कर दिया यूँ दरबदर
क्या कुसूर था उस वृध्दा का,
जो किया उसे बेघर।
छीन के ठिकाना उसका,
कर दिया यूंँ दरबदर।।
देखे वो लाचार हाथ,
उठे थे जो दुआओं मे।
देखे वो झर झर अश्रु,
बुझी हुयी निगाहों मे।।
फेंक वृध्दाश्रम मे,
किया यूँ जीवन बंजर।
छीन के ठिकाना उसका,
कर दिया यूंँ दरबदर।।
नजरें पथरा सी गयी,
दिल मुन्तजिर रहा आहट का।
ममता के अमृत मे,
विष घुल गया कड़वाहट का।।
औलाद के दिये घाव से,
कैसे आये इक मां को सबर।
छीन के ठिकाना उसका,
कर दिया यूंँ दरबदर।।
बूढ़ी आँखो मे छिपी,
बेइन्तहा प्यास थी।
लाल को देखन हेतु,
इक ललक, इक आस थी।।
अस्थिपिंजरा हुयी मां,
हालत हुयी यूं जर्जर।
छीन के ठिकाना उसका,
कर दिया यूंँ दरबदर।।
चारु मित्तल
मथुरा(उ०प्र०)

Comments
Post a Comment