मौन का मन से द्वंद्व : स्व-अस्तित्व क्या है?
मौन का मन से द्वंद्व : स्व-अस्तित्व क्या है?
मा कुरु वित्तेविकारः गर्वं, क्षीणे शनैःशनैकालः अर्थं ।
विश्वं विचारम् समसर्वं मूढाः, तदपि न मुञ्चति नरकनिगूढाः ।।
यह सर्वविदित है कि मौन सदैव मन को बहुरूपिया के नाम से अलंकृत करता रहा है, जो मन की गतिशीलता को देखते हुए पूर्णतः उचित भी है। मौन शून्य के समान स्थिर, शांत होता है, जबकि मन अस्थिरता का परिचायक, चंचल, गतिशील होता है, यही कारण है कि मौन का मन से सदैव द्वंद्व जारी रहता है। इस मौन व मन के बीच का द्वंद्व सदैव जायज बातों पर होता है, जिसका कुछ न कुछ प्रतिफल प्राप्त होता है, परंतु यह द्वंद्व जब बाह्य तत्वों से अस्तित्व के समक्ष हो तो बहुत ही पीड़ादायक व आत्मघाती हो जाता है। बाह्य व आंतरिक तत्वों में एक-दूसरे को सताने की प्रवृत्ति प्रकृति प्रदत्त होती है, जो एक-दूसरे के समक्ष एक आलोचक के रूप में कार्यरत होती हैं, मगर यह एक निश्चित सीमा के बाद आलोचक का अवरोधक के रूप में परिवर्तन होना, महाविनाश को जन्म देता है। यहीं से उत्पन्न होती है, स्व-अस्तित्व की तलाश ! जो हर किसी को पंचमहाभूत तत्वों द्वारा बहुत पहले पठन रूप में पढ़ा दी गई होती है, मगर स्व-अस्तित्व की यह परिभाषा महज रटे-रटाये पाठ स्वरूप अपूर्ण थी, क्योंकि दृश्यमान जीवन के दृष्टिकोण में स्व-अस्तित्व के कोणों के कोर शून्य की निश्चित माप के समान अमाप ही रहते हैं।
धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दुख पहुँचाना सबसे बड़ा अपराध होता है, परंतु लोभी मन की प्रवृत्ति स्व-सुख की अभिलाषा में अन्य के अस्तित्व को मौन से मिलाप करवा देना, सुखी अनुभूति है। ऐसे लोभी मन इसी क्रिया की बारंबारता में ही अपने स्व-सुख की तलाश करते नजर आते हैं, फिर चाहें सामने जो भी हो! फर्क नहीं पड़ता। मन द्वारा क्षणिक सुख की यह प्राप्ति जाने कितनों के अस्तित्व को गुमशुदगी से परिचित करा जाता है। भावों से खेलना, छेड़छाड़ करना, उसमें आनंदित होना गलत नहीं, परंतु भावनाओं को आधार बनाकर हृदय को आघात देना सबसे बड़ा गुनाह होता है, क्योंकि स्व-सुख की प्राप्ति में आप समक्ष अस्तित्व की निर्मम हत्या कर रहे होते हैं, जो इस समस्त सृष्टि का सबसे जघन्य अपराध है। हृदय वह स्थान है, जहाँ सम्यक् प्रेमपूर्ण आमंत्रण निहित है, ऐसे स्थान पर आघात करना महाविनाश का आमंत्रण है।
परिणामस्वरूप स्व-अस्तित्व के खोज की गति अनियंत्रित दौड़ अनियमितता के पथ पर इतनी घातक हो जाती है कि कब अस्तित्व शून्य में विलीन हो जाएगी, ज्ञात नहीं होता, क्योंकि यह ऐसा मन से मौन का द्वंद्व काल होता है, जो शून्य में उस सृष्टि की तलाश कर रहा होता है, जिसका खुद का ही कोई अस्तित्व नहीं है।
यावत् अर्थं निवसति सक्तः, तावत् परिजने भावय रक्तः ।
गतवति हस्तः क्षीणे वित्तम्, भार्या कोऽपि न पृच्छति चित्तं ।।
इस स्वप्नमय संसार की रीति सर्वदा एक जैसी ही दिखती है, "विश्वं विचारम् नरकनिगूढाः, वित्तेविकारः पण्डित च मूढाः" धन को धार्मिक रूप में पूज्यनीय मान्यता देने का श्रेय ज्ञानी-अज्ञानी दोनों का एक समान ही दिखता है। जब तक आप धनोपार्जन में सफल हैं, तब तक आपके परिजन से लेकर सर्वसमाज आपको सम्मान, स्नेह देने में पीछे नहीं रहता, जबकि जैसे ही आपकी यह क्षमता क्षीण होने लगती है, तो परिजन क्या, समाज क्या? स्वयं की पत्नी भी तानें मारने या साथ छोड़ने में पीछे नहीं हटती। धन के सम्मुख तन व मन से किसी के लिए किए गए श्रम सब बेकार होते हैं, अब प्रश्न यह उठता है कि व्यक्ति जीवनपर्यंत धनाढ्य कैसे रहे? जबकि लक्ष्मी अनवरत गतिशीलता का अनुसरण करती है।
क्षीणे भार्या परिजने, शनैः क्षीणे यौर्वने ।
माने क्षीणे परिजने, सुधियां कुन्जे खण्डिते ।।
वित्तेविकारः भार्या त्यक्त्वा अर्थात् धन, वैभव की लालची पत्नी भी दुर्दिन के समय तुम्हारे अस्तित्व का ही त्याग कर देती है। पत्नी व परिजन का स्नेह जब क्षीण होने लगे, धीरे-धीरे चेहरे की चमक जब ढलने लगे, मान-सम्मान, प्रतिष्ठा, वैभव जब घटने लगे तो बुद्धिमान को चाहिए स्व-अस्तित्व की रक्षा हेतु स्वयं उस गृह के मोहजाल से मुक्त हो जाए। क्योंकि "चित्ते प्रसन्नः त्यक्त्वा निवासः" मन को प्रसन्न रखने व स्व-अस्तित्व रक्षा व सुदृढ़ता की पुनः प्राप्ति हेतु निवास का त्याग बहुत ही जरूरी हो जाता है। जब उसे गरज़ नहीं, तो तुम्हें उसकी गरज़ क्यों हो? "राजन्गतोऽस्मि" लो, हम भी चलते हैं।
का ते भार्या कस्त्वं गेहे, कस्य त्वं वा कस्ते देहे ।
कस्त्वं कोऽहं कुत अयातः, तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ।।
अर्थात् कौन तुम्हारी पत्नी, कौन सा तुम्हारा घर है? तुम कौन हो और तुम्हारा शरीर कैसा? तुम आखिर कहाँ से और क्यों आए हो? भाई ! इन बातों पर पहले स्व-विचार तो कर लो। यही मौन व मन के बीच द्वंद्व का असली कारण है, जो स्व-अस्तित्व की तलाश को जन्म देता है। मन इस अपने-पराये, मोह-माया के जाल में उलझा स्व-अस्तित्व को ही भूल जाता है, परंतु जब इस स्व-अस्तित्व पर मौन का हृदयघात होता है तो सच में बहुत तकलीफ होती है और व्यक्ति स्व-अस्तित्व की तलाश में स्वयं का त्याग कर देता है, क्योंकि तलाश वस्तुओं की जाती है, शून्यता की नहीं! फिर भी धिक्कार, लताड़ भावनाओं के रास्ते हृदय को इतना आघात दे जाते हैं कि व्यक्ति के सम्मुख दिशाओं के कोण शून्य सदृश्य हो जाते हैं और व्यक्ति की विवशता त्रिशंकु की भाँति हो जाती है। फिर शुरू होती है, एक कभी न खत्म होने वाली तलाश, स्व-अस्तित्व की तलाश !
मिथलेश सिंह मिलिंद
मरहट पवई आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश)
9682472270
mith3032@gmail.com

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