सोचते बहुत हो

 सोचते बहुत हो


((((((***(*(((((

शायद तुम्हें अहसास नहीं है

कि तुम सोचते बहुत हो,

इसीलिए तुम्हें पता ही नहीं है कि

इतना सोचने के बाद

किसी मंजिल पर पहुँचते ही कहाँ हो?

चलो माना कि तुम

किसी और मिट्टी के बने हो।

पर भला ये तो सोचो

इतना सोचकर भी तुम

आखिर पाते क्या हो?

चलो माना कि 

ये तुम्हारा स्वभाव है,

पर ऐसा स्वभाव भी

भला किस काम का,

जो तुम्हें भरमा रहा हो,

तुम्हारे किसी काम

तनिक भी न आ रहा हो।

अपने सोच का दायरा घटाओ,

बस इतना ही सोचो

जो तुम्हारा दायरा ही न बढ़ाये

बल्कि तुम्हारे काम भी आये,

अब इतना भी न सोचो

कि सोचने का ठप्पा

तुम्हारे माथे पर चिपक जाये।

👉 सुधीर श्रीवास्तव

        गोण्डा, उ.प्र.

        8115285921

Comments

Popular posts from this blog

बिजनौर मे अवैध खनन रोकने के लिए आरटीओ एवं खनन निरीक्षक द्वारा भागूवाला चेक पोस्ट पर किया गया प्रवर्तन कार्य, 07 वाहनों का किया गया चालान

पुस्तक समीक्षा " काव्य साधना "

प्रेस मैटर* *राष्ट्रीय साझा काव्य संकलन *काव्यांगन*का हुआ विमोचन*