बाब-ए-दक्खन असीरगढ़ का दुर्ग-

बाब-ए-दक्खन असीरगढ़ का दुर्ग-
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दुर्गों की धरा कहे जाने वाले मध्यप्रदेश के मालवा के बुरहानपुर जिले में स्थित है भारत के 7 अजेय दुर्गों में से एक असीरगढ़ का विश्वप्रसिद्ध दुर्ग।

इस विशाल अजेय दुर्ग का निर्माण 14वी सदी की शुरुआत में हैहयवंशी अहीर क्षत्रिय शासक महाराजा अशा अहीर ने करवाया था। 

हैहय अहीर राजवंश के शासन के कारण ही इसको असीरगढ कहा जाता है।

260 मीटर ऊंचा यह दुर्ग एक ऊंचे पर्वत के शिखर पर एक साधु के आशिर्वाद से महाराजा अशा अहीर द्वारा इस दुर्गम किले का निर्माण बलुआ पत्थर से करवाया गया था। 

इस दुर्ग की चढ़ाई लगभग नामुमकिन सी है और समस्त आर्यवर्त में इस किले के टक्कर के सिर्फ दो ही किले हैं- कुंभलगढ़ का दुर्ग और चित्तौड़गढ़ का दुर्ग।

अति दुर्गम चढाई वाला यह दुर्ग राजपुताना, गुजरात और उत्तरप्रदेश से लगभग बरारब दूरी पर होने के नाते Strategic point से महत्वपूर्ण माना गया लेकिन आज तक इस दुर्ग को कोई भी बाहुबल से फत़ह न कर पाया।

इस दुर्ग को इतिहासकारों ने "बाब-ए-दक्खन" दक्षिण का द्वार और "कलोद-ए-दक्खन" दक्षिण की कूंजी कहा है।

ऐसा माना जाता है कि बाबर ने जब भारत विजय के दौरान जब इस आक्रमण किया तो महाराजा अशा अहीर से वो पराजित हुआ था।

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इतिहासकारों के अनुसार हैहयवंशी महाक्षत्रप महाराजा अशा अहीर, माहिष्मती नरेश सम्राट सहस्त्रार्जुन की पीढ़ी के आखिरी शासक थे। 

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कलयुग में आगे चल इसी महान हैहयवंशी अहीर कुल में कई महान शासकों ने जन्म लिया और अपने पुर्वजों की कीर्तिपताका को फिर से फहराया जिसमें महाक्षत्रप सम्राट ईश्वर सेन अभीर प्रमुख हैं।

सम्राट सहस्त्रार्जुन के ही पीढ़ी के राजा महाक्षत्रप सम्राट ईश्वरसेन अहीर ने पूरे पश्चिम भारत पर सन् 1200 BC में राज किया था।

सम्राट ईश्वरसेन अहीर को 'राजन' और 'महाक्षत्रप' की भी उपाधियाँ थी तथा इन्होनें एक संवत/Calendar भी शुरू किया था "अहीर-कलचुरी-चेदी संवत" समय की गणना हेतु ।

जैसे सम्राट विक्रमादित्य ने 'विक्रम संवत्' शुरू किया था ठीक वैसे ही महाक्षत्रप ईश्वरसेन अहीर ने " अहीर-कलचुरी-चेदी " संवत् शुरू किया था।

अहीर-कलचुरी-चेदी संवत् 248- 250 CE से शुरू होकर 13th Century CE तक कायम रहा।

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इसी राजवंश में महाराजा अशा अहीर जन्मे जो इस पीढ़ी के आखिरी शासक थे। 

महाराजा आशा अहीर ने अपने शासन के दौरान यहाँ अपने मूल पुरूष सम्राट सहस्त्रार्जुन और अपने अराध्य महादेव के गुप्तेश्वर मंदिर की प्रतिष्ठा कराई। 

गुप्तेश्वर महादेव का मंदिर आज भी यहाँ मौजूद है। 

ऐसी मान्यता है कि महाभारत के प्रसिद्ध द्रोणपुत्र अश्वथामा जो अमर हैं आज भी इस दुर्ग में भटक रहै हैं ।

ऐसा कहा जाता है चारण-भाटों द्वारा कि अश्वथामा महाराजा अशा अहीर एवं उनके राजपरिवार की रक्षा करते थे और जब तक महाराजा अशा अहीर न चाहें तबतक इस दुर्ग में कोई प्रवेश नहीं कर पाता था।

इस अजेय दुर्ग को जीतने के लिए उस समय सभी मुस्लिम आक्रांता इस पर नज़रे गढाए हुए थे।

महाराजा अशा अहीर अत्यंत दयालु और दानवीर प्रवत्ति के क्षत्रिय थे इसलिए उनकी उदारता का फ़ायदा उठाते हुए एक बार मुसलमान आक्रांता नसीर ख़ान फ़रुक्खी ने किले को हथियाने के नापाक इरादे से महाराजा अशा के राजदरबार में आकर गिड़गिड़ाते हुए उन्हें उनके क्षत्रिय धर्म की दुहाई देते हुए अपनी रानियों और पुत्रों के लिए कुछ दिनों के लिए किले में आसरा मांगने लगा।

महाराजा अशा ने नसीर ख़ान पर दया दिखाते हुए उसके रानियों और बच्चों को किले में अश्रय देने के लिए सहमत हो गए।

औरतों की शाहि डोलियों में सवार हो कपटी नसीर ख़ान और उसके मुस्लिम सैनिकों ने जैसे ही दुर्ग के अंदर प्रवेश किया वैसे ही छल से महाराजा और उनके निहत्थे पुत्रों की हत्या करदी।

महाराजा अशा अहीर की रानियों ने अपने क्षत्रिय आन-बान की रक्षा हेतु किले में जौहर कर लिया और इस प्रकार इस महान हैहय अहीर राजवंश का दुखद अंत हो गया। 

हम क्षत्रियों ने कभी भी अपने अतीत से नहीं सीखा और हर बार कपटी मुस्लमान लुटेरों ने हमारे साथ क्षल किया।  जिसका एक उदाहरण पृथ्वीराज और गौरी के मध्य लड़ा तराई का प्रथम युद्ध भी है जिसमें वीर  पृथ्वीराज की दयालु पृवत्ति का फ़ायदा उठाया कपटी गौरी ने।

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हालांकि इस पवित्र दुर्ग में पापी असुर नसीर खान का वंश ज़्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह सका और कहा जाता है कि अश्वथामा ने महाराजा अशा अहीर की मृत्यु का प्रतिशोध नसीर खान और उसके वंश को मरवाकर लिया।

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दुर्ग के गुप्तेश्वर महादेव मंदिर में आज भी अश्वथामा सर्वप्रथम पूजन अर्चना करते हैं और कई लोगों ने उन्हें दुर्ग में देखने का दावा भी किया है।

और सूर्यास्त के बाद लोगो का कहना है कि इस दुर्ग से भयानक चितकारियां सुनाई पड़ती हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि दुर्ग की दिवारों को कोई ज़ोर ज़ोर से पीट रहा हो।

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2015-16 में मध्यप्रदेश सरकार ने इसका सौंदर्यीकरण और जीर्णोद्धार का कार्य शुरू कराया था।

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UNESCO की प्रसिद्ध  world heritage sites में भी शुमार है यह दुर्ग।
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अतीत के सुनहरी यादों को संजोए यह विशाल दुर्ग आज भी ज्यों का त्यों खड़ा है।

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काफ़ी गहन कर हमारी टीम आज इस दुर्ग के दुर्लभ इतिहास को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही है

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Post By : #Raghvendra Singh Yadav

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